उज्जैन - नगर परिचय :::::::
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कालिदास और विक्रमादित्य की नगरी उज्जैनएक प्राचीन धार्मिक महत्व की नगरी, जहां विराजते हैं बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक - भगवान श्री महाकालेश्वर 

हजारों साल से यह नगरी सभ्यता, संस्कृति और धर्म की यात्रा की गवाह रही है। कर्क रेखा यहीं से गुजरती है इस लिए इसे समय का वैसा ही केंद्र माना जाता  था  जैसा इन दिनों ग्रीनविच को मानते हैं। उज्जैन नगर के अधिष्ठात्री देव देवों के देव महादेव हैं, उनका रूप बड़ा विचित्र है। यहाँ उन्हें काल का स्वामी अर्थात महाकालेश्वर कहा जाता है। नगर से कुछ ही दूरी पर कृष्ण और सुदामा के गुरु सांदीपनि ऋषि का आश्रम भी है जहाँ दोनों ने शिक्षा ग्रहण की थी। उज्जयिनी भारत की सात पुराण प्रसिध्द नगरियों में प्रमुख स्थान रखती है। उज्जयिनी में प्रति बारह वर्षों में सिंहस्थ महापर्व का आयोजन होता है। इस अवसर पर देश-विदेश से करोड़ों श्रध्दालु भक्तजन, साधु-संत, महात्मा महामंडलेश्वर एवं अखाड़े प्रमुख उज्जयिनी में कल्पवास कर मोक्ष प्राप्ति की मंगल कामना करते हैं। अतीत में उज्जैन को अवंतिका, उज्जयिनी, विशाला, प्रतिकल्पा, कुमुदवती, स्वर्णशृंगा,अमरावती आदि अनेक नामों से पहचाना जाता था।  मानव सभ्यता के प्रारंभ से यह भारत के एक महान तीर्थ-स्थल के रूप में विकसित हुआ।

पुण्य सलिला क्षिप्रा के दाहिने तट पर बसे इस नगर को भारत की मोक्षदायक सप्तपुरियों में एक माना गया है।  क्षिप्रा नदी त्रिवेणी से उज्जैन नगरी में प्रवेश कर गऊ घाट, राम घाट, भर्तृहरि गुफा, पीर मछिन्दर और गढकालिका का क्षेत्र पार कर नदी मंगलनाथ पहुँचती है। सिध्दवट और काल भैरव की ओर मुड़कर क्षिप्रा कालियादेह महल को घेरते हुई चुपचाप उज्जैन से आगे अपनी यात्रा पर बढ जाती है।

उज्जयिनी की ऐतिहासिकता का प्रमाण ई। सन् 600 वर्ष पूर्व मिलता है। तत्कालीन समय में भारत में जो सोलह जनपद थे उनमें अवंति जनपद भी एक था। अवंति उत्तर एवं दक्षिण इन दो भागों में विभक्त होकर उत्तरी भाग की राजधानी उज्जैन थी तथा दक्षिण भाग की राजधानी महिष्मति थी। उस समय चंद्रप्रद्योत नामक सम्राट अवंति जनपद के शासक थे।  प्रद्योत के वंशजों का उज्जैन पर ईसा की तीसरी शताब्दी तक प्रभुत्व था। राजनैतिक इतिहास उज्जैन का काफी लम्बा रहा है। उज्जैन के गढ़ क्षेत्र से हुयी खुदाई में लोहयुगीन सामग्री प्रचुर मात्र में प्राप्त हुई है। पुराणों व महाभारत में उज्जयिनी का उल्लेख उल्लेख आता है। कृष्ण की एक पत्नी मित्रवृन्दा उज्जैन की ही राजकुमारी थी। उसके दो भाई विन्द एवं अनुविन्द महाभारत युद्ध में कौरवों की और से युद्ध करते हुए वीर गति को प्राप्त हुए थे। ईसा की छठी सदी में उज्जैन में एक अत्यंत प्रतापी राजा हुए जिनका नाम चंड प्रद्योत था। भारत के अन्य शासक उससे भय खाते थे। उसकी दुहिता वासवदत्ता एवं वत्सनरेश उदयन की प्रणय गाथा इतिहास प्रसिद्द है। प्रद्योत वंश के उपरांत उज्जैन मगध साम्राज्य का अंग बन गया।

महाकवि कालिदास उज्जयिनी के इतिहास प्रसिध्द सम्राट विक्रमादित्य के दरबार के नवरत्नों में से एक थे। इनको उज्जयिनी अत्यंत प्रिय थी। इसीलिये कालिदास ने उज्जयिनी का अत्यंत ही सुंदर वर्णन किया है। सम्राट विक्रमादित्य ही महाकवि कालिदास के वास्तविक आश्रयदाता के रूप में प्रख्यात है। महाकवि कालिदास की मालवा के प्रति गहरी आस्था थी। उज्जयिनी में ही उन्होंने अत्यधिक प्रवास-काल व्यतीत किया और यहींपर कालिदास ने उज्जयिनी के प्राचीन एवं गौरवशाली वैभव को देखा। वैभवशाली अट्टालिकाओं, उदयन, वासवदत्ता की प्रणय गाथा, भगवान महाकाल संध्याकालीन आरती तथा नृत्य करती गौरीगनाओं के सात ही क्षिप्रा नदी का पौराणिक महत्व आदि से भली भांति परिचित होने का अवसर भी प्राप्त किया हुआ जान पडता है।

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मेघदूत' में महाकवि कालिदास ने उज्जयिनी का सुंदर वर्णन करते हुए कहा है कि जब स्वर्गीय जीवों को अपने पुण्यक्षीण होने की स्थिति में पृथ्वी पर आना पडा। तब उन्होंने विचार किया कि हम अपने साथ स्वर्ग का एक खंड (टुकड़ा) भी ले चले। वही स्वर्गखंड उज्जयिनी है। आज भी विश्व में उज्जयिनी का धार्मिक-पौराणिक एवं ऐतिहासिक महत्व के साथ ही ज्योतिक्ष क्षेत्र का महत्व भी प्रसिध्द है। कालजयी कवि कालिदास और महान रचनाकार बाणभट्ट ने नगर की खूबसूरती को जादुई निरूपति किया है। उज्जैन नगर और अंचल की प्रमुख बोली मीठी मालवी बोली है।

उज्जैन का ऎतिहासिक महत्व
उज्जैन का इतिहास विस्तृत रूप में विभिन्न कथाओं से जुड़ा है. उज्जैन से प्राप्त ऐतिहासिक साक्ष्य विस्तृ्त रूप में प्राप्त होते हैं. उज्जैन महाराजा विक्रमादित्य की राजधानी थी इसके अतिरिक्त उज्जैन मे ही महाकवि कालिदास ने अपने काव्य ग्रंथों की रचना की व उज्जयिनी का बहुत सुंदर वर्णन किया. उज्जैन नगर कालीदास को बहुत प्रिय रह जिस कारण उन्होंने अपने प्रवास का ज्यादातर समय उज्जैन मे ही व्यतीत किया तथा उज्जैन के वैभवशाली गौरव के बारे मे विस्तार पूर्वक उल्लेख किया.
मेघदूत में कवि कालिदास ने उज्जयिनी का बहुत ही मनोरम वर्णन किया है उन्होंने इस इस जगह को स्वर्ग का आधार दर्शाया. कालीदास ने महाकालेश्वर व क्षिप्रा नदी के पौराणिक महत्त्व को अत्यंत प्रमुखता एवं सौंदर्य के साथ वर्णित किया जो आज भी साहित्य जगत कि अमूल्य धरोहर है.
उज्जैन का पौरानिक महत्व

उज्जैन के इतिहास व उसके गौरवशाली अतित के बारे में विभिन्न धार्मिक ग्रंथों में भी काफी विस्तार के साथ बताया गया है. पुराणों में उल्लेख है की कृष्ण व बलराम उज्जैन नगर में विद्या प्राप्त करने गुरु सांदीपनी के आश्रम में आये थे. इसके साथ ही भगवान श्री कृष्ण की पत्नी मित्रवृन्दा उज्जैन की राजकुमारी थी. उज्जैन का राजा चंडप्रद्योत एक प्रतापी राजा था उसकी पुत्री वासवदत्ता एवं वत्स राज्य के राजा उदयन की प्रेम कथा इतिहास में बहुत प्रसिद्ध है. बाद में उज्जैन मगधसाम्राज्य का अभिन्न अंग बन गया था़.
प्राचीन समय में विशाला, प्रतिकल्पा, कुमुदवती, स्वर्णशृंगा तथा अमरावती आदि विभिन्न नामों से जाना जाने वाली यह उज्जैन नगरी भारत के प्रमुख तीर्थस्थल के रूप में विख्यात है. इस नगर को भारत की 'सप्तपुरियों' में से एक माना गया. उज्जैन नगर मे स्थित महाकालेश्वर बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है. तुलसी दास से लेकर साहित्य के अनेक प्रसिद्ध कवियों ने इस मंदिर का विस्तार पूर्वक उल्लेख किया है.
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